Search This Blog

Wednesday, 14 October 2020

विपासना

 आज पूरा विश्व जब एक अदृश्य शत्रु, जिसे हमने कोरोना या कोविड - १९ का नाम दे दिया है , से अहर्निश जीवन की जंग लड़ रहा है ; सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि  किस प्रकार हम सभी शांत चित्त होकर इस समस्या का सामना करते हैं और स्वयं को जीवित रख पाते हैं। इस बात को भी कहना ज़रूरी है कि यदि आप मनोवैज्ञानिक रूप से कमजोर पड़  गए तो जीवन हार जायेगा.


मनोबल बनाए रखें...

                       आजकल नया फैशन चला है, जिसमें कुछ कहना हो या बेचना " इम्युनिटी " नामक विशेषण का प्रयोग अनिवार्य है।विश्व की सभी सरकारें और वैज्ञानिक अपना अपना काम कर रहे हैं और ऐसे में हमारा सीमित सा रोल स्वयं को मानसिक रूप से सक्षम रखना है। ताकि तर्कसंगत व्यवहार कर पाएं और मन से हार न मान लें। 

      

        सहस्त्रों वर्षों से हमारी परम्परा रही है - मन को वश में रखना और विश्व प्रेम का एक उदाहरण बन कर सबको सही मार्ग पर अग्रसर कराना। इस दिशा में आगे बढ़ने के  लिए  सर्वोपरि स्थान मैं तो मेडिटेशन यानि ध्यान का समझता हूँ और इससे सम्बिन्धित किसी शास्त्र नहीं बल्कि अपने अनुभव साझा करने के उद्देश्य से यह लेख देने की कोशिश कर  रहा हूँ। ध्यान करने के लिए  कई तरीके हो सकते हैं किन्तु आपको सभी नावों पर पैर  रख कर जाने की जरूरत नहीं है और शायद इतना वक़्त भी नहीं है कि आप शोध कार्य में लग जाएँ।एक विज्ञान शिक्षा  प्राप्त होने के कारण आसानी से मेरा भी विश्वास नहीं बैठा,किन्तु जब अवकाश प्राप्त होने के बाद एक विपासना कोर्स मैंने किया तो मेरी  प्रथम दृश्य प्रतिक्रिया ये थी कि  मैंने इस ओर इतनी देर से ध्यान क्यों दिया ?  आज के युग में मानसिक शांति बिरले लोगों को ही मिलती है, क्यूंकि इसका सम्बन्ध किसी बाहरी वस्तु से न होकर आपके स्वयं से है। चलिए आगे चलें और समझें कि,


 विपासना ध्यान क्या है....?


 यह शब्द विपश्चना से बना है और इसे अपनाने वाले साधक को विपश्चि खा जाता है।  पश्य शब्द का अर्थ होता है देखना , और विपश्य मतलब विशेष  देखना. इसमें चूँकि हम अंतर्मन में देखना चाहते हैं तो विपासना शब्द और पद्धति का संदर्भ आता  है। चूंकि ध्यान का उद्देश्य एकाग्रता बढ़ाना  है तो हम इसमें माध्यम चुनते हैं अपनी आती जाती साँस  को।


 कहते हैं  मन एक बंदर की तरह होता है और इसको वश  में करना एक कठिन कार्य है।  तो मन वश में रखना है  ताकि परेशान करने वाले विचार आ आकर हमारा चैन न छीनें। साँस  जन्म से लेकर मृत्यु तक हमारे साथ रहती है इसलिए इसी पर विपासना में कार्य करते हैं।  कार्य केवल यह  की आँखें बंद क  किसी भी आराम दायक मुद्रा - आसान में बैठें और अपने आते जाते सांस का प्रेक्षण करें-  किस रंध्र से आ जा रहा है ? और कैसा अनुभव हो रहा है नासिका की नली में ?  इस प्रक्रिया को आनापानसति  कहा गया है , जिसका अर्थ है आती जाती साँस को साक्ष्य बनाना। इस प्रक्रिया का उद्देश्य यही  है कि मन में इधर उधर के विचार न आकर केवल एक काम में लगा रहे और वो है साँस के साथ रहना।

       

मन की मजबूती..


         जब इस तरह मन एकाग्र होने लगता है तब साधक को धीरे धीरे अपने शरीर के आंतरिक अंगों का निरीक्षण मन द्वारा कराया जाता है और इस तरह उसको मन से इतना दृढ़ किया जाता है कि वह अपने विचारों में दूषित चीजें न लाये।


प्रसन्नता का स्रोत...


                 विपासना किसी धर्म से संलग्न नहीं है ।हालाकि इसका तरीका गौतम बुद्ध की ध्यान विधि से सम्बद्ध है। विपासना के मुख्य सिद्धांत हैं कि कोई भी चीज स्थायी नहीं है। चाहे वो सुख देने वाली लगे या दुःख देने वाली।   अतः  मनुष्य को सुख और दुःख में समभाव  या स्थितप्रज्ञ रहना है। इच्छारहित हो जाना ही आत्म  मुक्ति का साधन भी कहा गया है.. 


                  आप इस प्रक्रिया में अपनी लगन के अनुसार परिणाम पा सकते हैं। मान लीजिए मुक्ति पाना आपका उद्देश्य न भी हो तो कम से कम इस जीवन में आप ध्यान द्वारा अवश्य ही खुश रह पाएंगे और अपने साथ साथ चारों ओर एक ख़ुशी का माहौल बना पायेंगे। मेरे विचार से यही श्रेयस्कर स्थिति है...।

-----------------------------

✍️अरुण प्रदीप 

No comments:

Post a Comment