तुम्हारा कनु
-- अरुण प्रदीप
कभी वैलेंटाइन का गुलाब
तो कभी ईद का मुबारक़ चाँद
किसी धर्म निरपेक्षा सी तुम
आ जाती हो मेरे सामने
सॉरी, तुम नहीं आतीं
आती है सिर्फ़ तुम्हारी याद.
तुम्हारे लंबे घने बाल आज भी
ढक लेते हैं आकाश मेरा
कालिदास के मेघदूत से
दो कत्थई लट्टुओं सी
नीलाभ सागर में तैरती आंखे तुम्हारी
अक़्सर देखने लगती हैं मुझे
टकटकी लगाकर.
प्रेम हमारा शुक्ल पक्ष के चाँद सा
हुआ था षोडश कला युक्त
फिर क्यूँ मृतप्राय हो गया
नियम विरुद्ध असमय ही.
और वादे के बावज़ूद
तुम बन न पायीं रुक्मिणी
न ही रह पायीं राधा
और मीरा !
मीरा बनाना तो मुझे था नापसंद
कोमल भावनाओं के बीच
तुमने बना दिया मुझे
बस और बस तुम्हारा कनु !
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